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खुदा   करे,  मेरी   कसम   का    उसे   एतवार    हो

मुहब्बत    फ़िर          रुसवा1    सरे    बाजार   हो

 

आँख  उसकी जब भी तरसे, जल्वा-ए-दीदार2 को

सामने     उसका    आजुर्दगी -ए- यार3   हो

 

छूट     जाए  हाथों  से  गरेबां  बहार  का

मुहब्बते  इंतजार  का  चढ़ा  हुआ  खुमार  हो

 

गम   की  अँधेरी  रात  में  तुम कहाँ  हो

जहाँ   भी  हो , आवाज  दो , तुम कहाँ हो

 

मिटती  नहीं  दागी उलफ़त  गुजर जाने  के

बाद   भी , सोचकर  तुम  क्यों  परेशां  हो

 

मुहब्बत  में  हसरतों  की  कमी  नहीं होती

मगर लबे-नाजुक पर इसका कुछ तो निशां हो

 

कैसे  कर  पूछूँ  उससे, दुनिया  का हाल, जो

खुशी  में अपना हाल अपने ही करता बयां हो

 

आखरी   दम   तक     रहता कोई जबां

बहारे-उम्र1  रहता नहीं वहाँ, जहाँ न खिजा हो

 

 

1.   जीवन वषंत

 


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