यह जन धरणी , मनुजों का स्वर्ग-घर बनी रहे पत्ते- पत्ते पर श्याम द्युति हरियाली छाई रहे सृष्टि ने गगन से उतार,गंगा को धरा पर लाया सोचा, इसकी शीतलता से दुष्काल अपने आप दूर भागेगा, सुधा वृक्ष उन्नत होगा मनुज मन के सहज वृत पर ग्य़ान जागेगा तब मनुज को निज मंगल का बोध होगा सुंदर सुखद सूर्य से सेवित यह धरा होगी इसके समक्ष प्राच्य सिंधु का मुक्ता तुच्छ होगा बरसेगा रिमझिम कर रंग अम्बर से मन-मन का स्वप्न मन से निकलकर भीगेगा तब पथ जोहती कूल पर वसुधा दीन-दुखी श्रांत, प्यासे असुरासुर से थकी नहीं होगी हर तरफ़ , क्षीर कल्प, जलपूर्ण सर- सरित अगरु सौरभ से भरित पवन होगा लेकिन मनुजों का विप्र,लोक जीवन के प्रतिनिधि को तरु पत्रों के अंतराल से छन-छन कर लोट रही भू रज पर किरणें, मन को नहीं | |
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